
बौनी नदियाँ सिमटी धारा
बैचैनी सी
कुछ मरघट से सन्नाटें है
टोक रहें है
अधर पर हैं सूखे मरुथल
पलकों में पल रहे सरोवर
ह्रदय दर्द के दावानल में
तड़प रहा है
धूल उड़ाती रहीं दिशाएँ
साँसे पीती रही ज़हर
धुँधले धुँधले वृत्त चित्र है
कौन किसी का यहाँ मित्र
झूँठ और सच अदले बदले
दुहरा तिहरा यही चरित्र
प्यासे रस्ते ढूँढ़ रहे हैं
ताल सरोवर और नहर
पीड़ा के पर्वत ऊँचें है
आँसू के जल से सींचें है ..
कुछ हमने सहना सीखा है
कुछ दुःख की मुट्ठी भींचें है
मत छेड़ो तुम लौ दीपक की
आग लगेगी किसी शहर को.











