
स्वार्थ जहाँ पर हार मान ले, प्रेम जहाँ मुस्काए,
ऐसी सच्ची मित्रता ही जीवन को महकाए।
कृष्ण-सुदामा सा हो रिश्ता, निर्मल और निष्काम,
संकट की हर धूप में बन जाए शीतल छाँव।
हँसते-हँसते बाँट सके जो पीड़ा का हर भार,
वही सखा कहलाता जग में, होता सबसे प्यार।
धन-दौलत से नहीं तुले जो, मन का हो सम्मान,
सच्चे मित्र के चरणों में बसता है भगवान।
रूठे मन को हँसा सके जो, दे साहस हर बार,
उसके संग जीवन लगता जैसे मधुर बहार।
सुख में सब अपने बन जाते, दुख में रहे जो साथ,
ऐसे मित्र का साथ मिले तो धन्य हो जाए जीवन-पथ।
विश्वासों की नींव अटल हो, स्नेह रहे अविराम,
मित्रता का यह पावन बंधन करता जग में नाम।
आओ ऐसी प्रीत निभाएँ, रहे सदा निष्कलंक,
जीवन भर महके मित्रता, बनकर प्रेम का अंक।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा’ सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार












