बाबू शोभनाथ सिंह मेमोरियल ट्रस्ट ठाणे केंद्रीय इकाई द्वारा व्याख्यान माला आयोजित की गई

शनिवार,2 अगस्त 2026
बाबू शोभनाथ सिंह मेमोरियल ट्रस्ट ठाणे केंद्रीय इकाई द्वारा सायंकाल 5 बजे एक व्याख्यान माला आयोजित की गई जिसमें आमंत्रित व्याख्याता श्री राजकिशोर वाजपेई ने “भारतीय संस्कृति” पर अपने मनमोहक मुग्धकारी व्याख्यान में प्राचीन भारतीय संस्कृति और मनीषियों के सांस्कृतिक दृष्टिकोण के लगभग हर आयाम को समेट लिया।
कार्यक्रम के आरंभ में डॉ ज्योति कृष्ण मिश्रा ने सुंदर भावों से सजी सरस्वती वंदना प्रस्तुत की और तत्पश्चात राष्ट्रीय सचिव सत्यभामा सिंहजी ने बाबू शोभनाथ सिंह मेमोरियल ट्रस्ट का संक्षिप्त परिचय देते हुए विद्वान राजकिशोर जी को व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया।
अपने व्याख्यान को शुरू करते हुए विद्वान वक्ता ने बताया कि भारतीय संस्कृति अनुभूति का विषय है और इसकी विषय वस्तु समूची वसुधा है। हमारे जितने भी देवविग्रह है वह किसी न किसी जीव या वृक्ष से जुड़े हैं । उनके वाहन मनुष्यों से अलग विभिन्न प्राणी हैं और यही सहजीवन का सूत्र भारतीय संस्कृति का आधार है। यह एक सार्वभौमिक दृष्टि है।पौराणिक कथाओं और शास्त्रार्थ की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि तर्क हमारी ज्ञान प्रणाली का हिस्सा है। तर्क में द्वेष और क्रोध को कोई स्थान नहीं। जो इनका आश्रय लेता है वह हारता है हमारी संस्कृति तर्क से उपजी है इसलिए तार्किक है।
महाभारत रामायण गीता आदि से विभिन्न दृष्टांत प्रस्तुत करते हुए आपने यह प्रतिपादित करने का प्रयास किया कि संस्कृति का लक्ष्य मनुष्यत्व को प्राप्त करना है। और हमें जीवन मूल्यों को अपने जीवन अपनानानितांत आवश्यक है।उन्होंने बताया कि हमारी संस्कृति पारस पत्थर हैै पर वह हमारी ही उपेक्षा का शिकार है।साधना के लिए गुरु चाहिए। गुरु कोई शरीर नहीं, गुरुत्व ज्ञान में होता है, वही गुरु को गुरु बनाता है। हमारी संस्कृति में स्थान भेद से विविधता दीखती है लेकिन उसकी मूल चेतना एक ही है।
व्याख्यान के उपरांत एक छोटा संवाद सत्र चला जिसमें श्रोताओं की जिज्ञासाएँ आमंत्रित की गईं और वे उत्तरित हुई।पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण पर सत्यभामा जी ने एक भावपूर्ण छंद सुनाया।संस्कृति जैसे व्यापक शब्द को एक व्याख्यान में समेट पाना बहुत कठिन कार्य है। हमें अपनी प्राचीन संस्कृति को फ़िर से जानने समझने और अपनाने की आवश्यकता क्योंकि हमारी आधुनिक पीढ़ी तेजी से अपसंस्कृति की ओर बढ़ रही है। त्याग की संस्कृति उपभोक्तावादी चंगुल में छटपटा रही है। सत्य और तप के मूल्य विकल हैं।
आख़िर में सत्यभामा सिंह जी ने आमंत्रित विद्वान वक्ता एवं पटल से जुड़े सभी श्रोताओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।












