
अबकी सावन में,
चलो गाँव की ओर।
झूलेंगे फिर झूलना,
मन में उठी हिलोर।
पावस के दिन बीतते,
दादुर मैना मौन।
शरद चाँदनी रात में भला,
इन्हें पूँछता कौन ?
पाँव महावर लग गया,
भरे माँग सिंदूर।
सपनों की ले पोटली,
गोरी चली सुदूर।
झूम रहा घर आँगना, सावन राग मल्हार।
बरस रहे तीनों सखी, नयना, बादल और प्यार।
इंद्र धनुष की चूड़ियाँ, मौसम का मनिहार।
प्रकृति के हाथ में,
रंगों का श्रृंगार।
उमड़े घुमड़े मेघ हैं,
बरसेगी जलधार।
पर धरती की प्यास का,कोई आर न पार।
मैना मोर पपीहरा,
सभी बसे पिय ठाँव।
सावन की बदरी भली,
बरसे जो उस गाँव।











