
सावन आया, हरित धरा पर खुशियों का विस्तार।
शिव-कृपा से महके जग में, जीवन हो साकार।।
घन-घोर घटाएँ नभ में छाईं, रिमझिम बरसे नीर,
भीगी माटी की सौंधी खुशबू, हर ले मन की पीर।
वन-उपवन नव रूप सजाएँ, कोंपल हँसती जाए,
मोर पंख फैलाकर नाचे, कोयल गीत सुनाए।
कल-कल करती नदियाँ बहतीं, झरने छेड़ें तान,
धरती ओढ़े हरित चुनरिया, पाकर नव सम्मान।
धान की बाली लहर-लहर कर, श्रम का मान बढ़ाए,
किसानों के श्रम से जग में, सुख-समृद्धि मुस्काए।
मंद समीर प्रेम का संदेशा, जन-जन तक पहुँचाए,
प्रकृति-माता का हर उपवन, जीवन-गीत सुनाए।
भोले शंकर कृपा बरसाएँ, मंगलमय संसार,
हर-हर महादेव गूँज उठे, मिटे सभी अंधकार।
वृक्ष लगाएँ, जल बचाएँ, यह संकल्प निभाएँ,
जल-जंगल और जीव सभी का, मिल संरक्षण पाएँ।
सावन, शिव और सुरम्य प्रकृति, अनुपम पावन दान,
प्रकृति-प्रेम ही सच्चा धन है, यही श्रेष्ठ सम्मान।
हरित धरा पर प्रेम खिले, मन में हो सत्कार,
शिव-कृपा से धन्य बने यह सुंदर सारा संसार।।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार










