
हनुमत करते हैं कृपा, भक्त जपें शुचि नाम।
भोर वंदना कर सदा, बोलें सीताराम।।
मिली हमें सौगात है,जग में अनुपम देह।
द्वेष-दम्भ को छोड़कर, करो सभी से स्नेह।
दीनानाथ दयालु हैं, परहित करते काज।
जीवन नैया पार कर, साजें सारा साज।।
सिर पर आशीर्वाद का, रखते जब हैं हाथ।
बरसे कृपा अपार है, बरसाते रघुनाथ।।
नष्ट करें अज्ञानता, गुरु दें ज्ञान प्रकाश।
भक्ति-भाव उल्लास से, हो कुबुद्धि का नाश।।
जन्म मरण सत्यार्थ है, इसको माने आप।
धर्म-कर्म शुभ योग से, कटते हैं संताप।।
चोरी करो न मित्र से, गुरु से कहो न झूठ।
गलत कर्म से भाग्य भी, हमसे जाता रूठ।।
चंदा की चोरी किए, जो भी जग के लोग।
दंड विधानों का उन्हें, करना है दुख भोग।।
दंड धरा पर ही मिले,जैसा जिसका काम।
देख रहे हनुमान जी, अवध खड़े अविराम।।
मात-पिता गुरु को करूंँ, बारंबार प्रणाम।
चरण गहूँ रघुनाथ के, मिलता है आराम।।
डॉ गीता पाण्डेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश












