
स्नेह के कच्चे धागे
सावन में फिर याद आये
ताउम्र जीते रहे जिस बचपन को
वो फिर बचपन लौट के ना आया
बचपन के सब खेल खिलौने
सारा सारा दिन खेले खुले आकाश में
और धूप की आँख मिचौली
लेकिन कुछ भी हाथ न आया
दही जलेबी का वो स्वाद
मिट्टी की हांडी का मठ्ठा याद
दिन होते जग जाते सब
मुहल्ले में दोस्त के संग जमता अड्डा
वो दिन वो लम्हे भी क्या थे
फिर वो लम्हा लौट न और ना वो दिन आया
तुम मेरी हमजोली बहना
रक्षा बंधन फिर है आया ।













