
हिमालय की गोद में जन्मी एक चाह,
मन में बस एक ही नाम—महादेव,
नयन बंद कर हर श्वास में पुकारा,
“स्वामी… तुम ही मेरे सत्य, तुम ही मेरे देव।”
कठोर तप की धूप में तपती रही,
विरह की रातों में दीप-सी जलती रही,
हर ऋतु बदली, हर पल बीता,
पर पार्वती का प्रण अटल ही रहा।
कैलाश पर बैठे थे शिव—
वैराग्य ओढ़े, समाधि में लीन,
पर भीतर कहीं एक स्पंदन था,
जो पुकारता था उस नारी को अधीन।
जब पहली बार दृष्टि मिली,
समय भी जैसे ठहर-सा गया,
तप का हर कण सफल हो उठा,
विरह का हर आँसू मोती बन गया।
यह प्रेम मांग नहीं था,
न कोई शर्त, न कोई अभिमान,
यह तो आत्मा का वह समर्पण था,
जहाँ “मैं” मिटे और “हम” हो प्राण।
शिव की जटाओं में गंगा बहती,
पार्वती की आँखों में विश्वास,
दोनों का मिलन सृष्टि बना,
दोनों का संग ही जीवन का प्रकाश।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













