
छपक-छपक
बाल-कविता
बरखा आई रिमझिम-रिमझिम, बूँदें मोती जैसी।
कूद पड़े सब बच्चे हँसकर, खुशियाँ आईं कैसी।
कागज़ की इक नाव बनाकर, बहते जल में छोड़ी।
हवा लगी तो आगे बढ़ती, जैसे दौड़ी घोड़ी।
मोर नाचा पंख पसारे, देख घटाएँ काली।
मेंढक जी ने गीत सुनाया, बजने लगीं ताली।
रंग-बिरंगी छतरी लेकर, निकल पड़े सब यार।
सावन वाला मौसम लाया, मस्ती की बौछार।
भीग रहे हैं पेड़-पौधे, महकी सारी बगिया।
हँसता-गाता दिन ये प्यारा, जैसे मीठी गुड़िया।
नन्हे कदम जहाँ भी पड़ते, बजती जल की झनक-झनक।
बचपन अपनी धुन में गाता, छपक-छपक बस छपक-छपक।
पूर्णिमा सुमन
झारखंड धनबाद
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