
गुरु कृपा के सागर हैं, गुरु ज्ञान का प्रकाश,
उनकी वाणी से मिटे, जीवन का हर त्रास।
गुरु ही ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु महेश महान,
गुरु चरणों में बसता है, सारा वेद-पुराण।
अज्ञान के घनघोर तम में, दीपक बन जो आए,
सत्य, प्रेम और धर्म का, पावन पथ दिखलाए।
गुरु के चरणों की धूलि से, जीवन पावन होता,
सूखी बंजर धरती पर भी, ज्ञान-सुमन तब खिलता।
गुरु ही साहस, गुरु ही शक्ति, गुरु श्रद्धा का सार,
उनकी कृपा से मिलता है, जीवन को आधार।
गुरु बिना यह जग सूना है, जैसे नभ बिन चाँद,
गुरु संग हो तो हर कठिनाई, बन जाती आसान।
इस गुरु पूर्णिमा के शुभ दिन, करें विनय से प्रणाम,
श्रद्धा के सुमन अर्पित हों, गूँजे गुरु का नाम।
हे गुरुदेव! ऐसा वर दें, ऊँचा हो व्यवहार,
सत्य, सेवा, करुणा से हो, जीवन सदा साकार।
ज्ञान, विनय और सद्गुण देकर, करें हृदय उजियार,
आपकी कृपा से ही होगा, जीवन का उद्धार।
बारम्बार वंदन आपको, स्वीकारें यह प्रणाम,
गुरु चरणों में अर्पित है, हमारा तन-मन-प्राण।
रूपेश कुमार
चैनपुर, सीवान, बिहार













