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शिव

कुंचित घुँघराले केशों से
गंगा की अविरल धार बहे
काले काले विषधर भुजंग
गौरांग अंग में लिपट रहे

भव बाधा नष्ट करे पल में
बस ध्यान तुम्हारा आशुतोष

मृग छाल लपेटे महादिव्य
दुखियों के दारुण दुःख हरते
तुम चिता भूमि की ले विभूति
शृंगार स्वयं अपना करते

दुँदभि ढोल बजते मृदंग
जब तांडव नृत्य होता सरोष

कर घोर तपस्या गौरी ने
पाया तेरा चिर साहचर्य
यदि तेरे भृकुटि के बल से
हो महा प्रलय क्या आश्चर्य

निज कृपा वृष्टि कर धो देना
सर्वेश हमारे पाप दोष

मस्तक पर तेरे रजनी कर
करता मद्धम सा मृदुल हास
वरदानों से भर दो अब तो
मुरझाता ये जीवन उदास

अभिशप्त क्षीण इन श्वासों में
भर दो डमरू का अमर घोष

उन्मीलित मस्तक मध्य नेत्र
हे आदि देव अवढर शंकर
हे महा सृष्टि के बीज बिंदु
हो सत्य तुम्हीं शिव भी सुंदर

उस आदि शून्य का अमर तत्व
अब भी जीवन का पारितोष

कर दो शिव ऐसा प्रलय नृत्य
हो चूर अहम् डूबे विषाद
छूटे असत्य मन का विकार
भागे मानव का ज्वर प्रमाद

जागो जागो शिव समाधिस्थ
फिर अनावृत हो ज्ञान कोष


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