Uncategorized
Trending

कविता

बरसात की बूँदें जब काँच पे दस्तक देती हैं,
तेरी यादें भी दिल के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो जाती हैं।

हर भीगा मोड़, हर गलियारा तेरा नाम पुकारता है,
मानो बरसात भी तेरे बिना अधूरा नज़ारा दिखाता है।

भीगे आँगन में तेरी हँसी की गूंज तलाशती हूँ,
किताबों के पन्नों पर बूँदों संग तेरा चेहरा बना लेती हूँ।

ये बादल, ये बिजली, ये ठंडी हवा —
सब कहते हैं तू पास है, फिर भी कितना दूर है।

बरसात तो हर साल आती है,
पर तू… तू अब कभी नहीं आता।

और मैं…
हर बूँद में तुझे ढूँढ़ती रह जाती हूँ।

डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *