
कहाँ तलक मैं गाऊं गाथा,
माया भोले न्यारी!
महिमा बरनी न जाए तेरी,
नीलकंठ त्रिपुरारी!!
चंद्रमुकुट है सर पर शोभित,
गल भुजंग की माला!
नील वर्ण बाघाम्बर सोहे,
अद्भुत रूप निराला!!
दूर करो भव बाधा सारी,
शीश चंद्र के धारी!
महिमा बरनि न जाए तेरी,
नीलकंठ त्रिपुरारी!!
समदृष्टि समभाव हो रखते,
हे महेश, कैलाशी!
करो उपकृत दया दृष्टि से,
दर्शन दो अविनाशी!!
देव दनुज ब्रह्मांड अखिल ये,
तेरे हैं आभारी!
महिमा बरनि न जाए तेरी,
नीलकंठ त्रिपुरारी!!
करुणा और दया के सागर,
दीनबंधु दुख हर्ता!
रूद्र रूप धर, दुष्ट दलन कर,
भक्तों के हित कर्ता!!
भोलेनाथ, हे महामृत्युंजय,
विनती सुनों हमारी!
महिमा बरनि न जाए तेरी,
निलकंठ त्रिपुरारी!!
‘जिज्ञासु’ के संकट हर सब,
करो मनोरथ पुरा!
सार्थक सक्रिय हो जीवन ये,
रहे न शेष अधूरा!!
एक सहारा तूँ ही जग में,
आया शरण तिहारी!
महिमा बरनि न जाए तेरी,
नीलकंठ त्रिपुरारी!!
कमलेश विष्णु सिंह ‘जिज्ञासु’













