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विषय माँ

जिन आंखों में माँ की तस्वीर न हो वह आंखें सूनी लगती है,

घर आंगन तो क्या कहें साहेब यह जीवन सूनी लगती है।

क्योंकि घर से लेकर बाहर तक सिर्फ माँ ही माँ याद आती है,

कैसे मैं बताऊं उनकी याद दिन रात मुझे सताती है।

क्योंकि जिसने गरीबी में भी हमको सब बच्चों को पाला पोसा है,

खुद की उम्र घटाकर मुझको बड़ा किया है खुद भूखी रहकर मेरा पेट भरा है।

ऐसी माता को एक जन्म तो क्या है हर जन्म में मैं पाना चाहूंगा,

क्योंकि माँ की कहानी लिखी न जाए माँ शब्द के आगे हर शब्द फीका है

चन्दे पासवान उर्फ अलबेला जी मधुबनी बिहार से,

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