
नश्वर इस जग में सब
जो जन्मा सो जाएगा …जाए कहां… नहीं पता किसी को
जाएंगे संग कर्मों के फल
बूटा कर्मों बोया था जो तूंने जग
कब फलेगा… कल फलेगा फल कब मिलेगा …
नहीं पता किसी को कैसा होगा कल
बोया कर्म फलेगा निश्चित
इस जन्म फल मिल जाएं
या फल मिल जाएं आने वाले भविष्य में कल
उस नियंता ने दी आंखें…जानबूझकर क्यूं बना तूं अंध ।
उस जग न कोई दबंग उतर जाएं गे सब रंग
सब जियें वहां कर्मों के संग
धुल जाएगा सब स्वांग और काया पर रंगा था रंग
कर्म फल में उगेंगे कांटे या मिलगी पुष्प सुगंध।
बिन इच्छा के तूं जी ले…
ये इच्छाएं ही उत्पन्न करें–हम रंग जांए अपने रंग
इच्छाओं के वशीभूत हुआ जो…
वही डूब गया इच्छाओं की तरंग
कर्म ही जीवन आधार… उस बिन न हो वैतरणी पार
कर्मों की नाव बना …. रास्ता देगी (भवसागर की) हर धार
कर्म फल जो चखे अब …
खट्टे-मीठे कांटों संग या संग थी पुष्प सुगंध
भाग्य तेरा लिखा जाएगा… उस विधाता से हाथों हाथ
जन्म लेते ही भाग्यशाली कहलाएगा
जब लिखा जाएगा तेरा जन्मांग… जो रचा भोलेनाथ
कर्म और भाग्य संग चलें…भाग्य मिले…किस्मत नहीं खराब
क्या जिया तूं धर्म के साथ ?
-महेश शर्मा- करनाल











