
मैं माथे का तिलक हूँ, पायल नहीं हूँ मैं,
दिल पे चोट है मगर, बेहाल नहीं हूँ मैं।
माँ-पापा के संस्कार, पहचान मेरी है,
किसी के इशारे पर, चलने वाला नहीं हूँ मैं।
घर ने सिखाया मुझे, इज्जत से जीना,
झुक कर प्यार मांगू, आदत नहीं है मेरी।
जो इज्जत दे वही, अपना है मेरे लिए,
हर किसी के पीछे, भागना काम नहीं मेरा।
अपनी मेहनत से ही, नाम कमाऊंगा मैं,
किसी के नाम का, मोहताज नहीं हूँ मैं।
गिर कर खुद उठूंगा, हंस कर चलूंगा मैं,
सहारे पर जीने की, फितरत नहीं है मेरी।
लोग कहते घमंड है, मुझमें भरा हुआ,
मैं कहता, ये घमंड नहीं, स्वाभिमान है मेरा।
जो समझे वो अपने हैं, सर आंखों पर हैं,
जो ना समझे उससे, कोई वास्ता नहीं मेरा।
माथे पर तिलक है, आंखों में जिद है,
टूट कर बिखर जाऊं, औकात नहीं है मेरी।
जलो तुम जितना है, अपनी जलन से,
मैं चिंगारी हूँ भाई, राख नहीं हूँ मैं।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)











