
अपने तो अपने होते हैं ,
उसे पराये,हम क्यो समझते है?
सुख दुख की हरेक घड़ी मे,
अपने ही तो,पास आते है ।
भले कभी-कभार थोडी मनमुटाव होती है,
विचार एक दुसरे से मेल नही खाती है,
निज मन मर्जी को ,हम कर लेते है
लेकिन फिर भी,अपनापन तो रखते है ।
नाराजगी का बात को मन मे रखकर
खुश ना रह सकोगे, अपनो से दुर होकर,
इस बात को ,हमे सोचना तो होता है,
जैसे भी हो,अपने तो फिर से मना लेते है।
दो चार की जिंदगी मे पराये को लेकर
अपनो से दुर रहना,है एकदम बेकार,
पराये तो सिर्फ, खुश मे ही दिखते है,
अपने तो,सदैव अपने ही होते है ।
चुन्नू साहा पाकूड झारखण्ड













