
शब्द शब्द मिल शक्तिवान है,
शब्द शब्द से साहित्य लिखा जाता है,
शब्द साहित्य से साहित्यकार,
लेखक और कवि बनता है।
साहित्य संस्कार देता है,
साहित्य इतिहास देता है,
साहित्य रस, भाव और
राग, रागिनी देता है।
राग, रागिनी से संगीत
और संगीत कार बनता है,
संगीत कार, गीत कार,
कवि, लेखक, साहित्यकार,
कलाकार, नाटक कार,
श्रोता और पाठक मिल,
समाज और सरकार बनाते हैं।
जब समाज से सरकार बनते हैं,
किंचित तब जाकर राजनीति,
कूटनीति शुरू हो जाती है,
यहाँ तक तो फिर भी ठीक है,
इसके आगे भ्रष्टाचार,
और मतभेद बढ़ते हैं,
मतभेद से मनभेद होता है,
मनभेद से मित्र- शत्रु होते हैं।
अंत में रामायण, महाभारत,
सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग,
इसका युग और उसका युग,
धर्म युद्ध, अधर्म युद्ध और
जाने क्या क्या होता है,
शब्द शक्ति की महिमा अपार है,
निराकार और साकार है,
आदित्य शब्द शक्ति अपरम्पार है।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, विद्या वाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ













