
उमड़-घुमड़ के घन नभ में छाए, लेकर जल की थात।
तप्त धरा के सूखे अधरों, पर बरसी सौगात।।
रिमझिम-रिमझिम बूँदें गातीं, मधुर मिलन के गीत।
भीगे अब तन-मन दोनों , बजते है संगीत।।
वन-उपवन हरियाए सारे, महकी मंद बयार।
डाली-डाली झूले पड़ते, गूँजे मंगल-धार।।
मोर पिया की आस लगाकर, नाचे पंख पसार।
कोयल मीठे स्वर में छेड़े, प्रेम भरा झंकार।।
खेतों में लहराई आशा, हँसता कृषक समाज।
मेहनत के माथे पे चमका, फिर खुशियों का ताज।।
नदियाँ लेकर नव उमंगें, बहतीं कल-कल नीर।
पुलकित होकर गाता सावन, प्रेम-सुधा गंभीर।।
सखियाँ मिलकर कजरी गाएँ, झूमें गाँव-गली।
मन के सूने आँगन में भी, खिली खुशी की कली।।
है सुमन यह ऋतु जीवन की, भर दे नव विश्वास।
सावन केवल मेघ नहीं है, आशा का मधुमास।।
पूर्णिमा सुमन











