
मैं दीप हूँ,
हर दिशा अंधेरों की चादर ओढ़े,
एक दीप की रोशनी उस अँधेरे को चीर कर अपनी बाहों में प्रकाश को अंगीकार किये नेपथ्य में दीपमान है
हाँ मैं दीप हूँ,
शेष जब तक बूँद भर भी चाह है
दिख रही दूर तक भी कोई चाह है
मैं अथक अविरल तुम्हारे साथ हूँ
हाँ मैं दीप हूँ,
प्रत्यक्ष तम में खुद को एक तिमिर चाह में समेटे सकुचाते सिमट गया हूँ
रोकता हूँ अकेले अंधकार में ओस की बूँद पिये जी रहा हूँ
हाँ मैं दीप हूँ
जो अंधकार को पछाड़ कर अपनी ही रोशनी में रोशन हूँ
और
नवांकुर पुष्प जो कुटिल चट्टान के नीचे दबा नवांकुरित होने को मचल रहा
क्योंकि मैं तो दीप हूँ।।।।
कुलदीप वर्मा











