
सनातन एक धर्म नहीं अपितु एक जीवन जीने की सभ्यता संस्कृति विधा है जिसमें एक काल था जब पूरा संसार निहित था किंतु समय की धारा के साथ सनातन संकुचित हो गया और मात्र एक छोटे से दायरे में सिमट गया कारण इंसान का अपने मूल से भटकना था। इंसान अपने अहंकार के वशीभूत स्वयंभू विधाता बन बैठा और अपनी ही एक दुनियाँ को जन्म देने में व्यस्त हो गया परिणाम दुनियाँ में कई संप्रदाय मत धर्म पनप गये। ये अपने आप में पूर्ण सत्य है कि सनातन का प्रादुर्भाव किसी व्यक्ति विशेष के द्वारा नहीं हुआ बल्कि जैसे वेदों को किसी मनुष्य के द्वारा नहीं रचा गया वैसे ही सनातन किसी मनुष्य जनित धर्म नहीं है ये एक जीवन जीने की दैवीय विधा है जिसको मूरख मनुष्य त्याग चुका है। मानव शरीर ईश्वर जनित है ये एक मशीन के जैसे कार्य करता है और ये सुचारु रूप से कार्य करे उसके लिए इसका व्यापक ध्यान रखा जाना जरूरी है ये खान पान योग व्यायाम आदि है। सनातन की सबसे बड़ी खूबसूरती योग है जो दुनियाँ के सबसे बड़े योगाचार्य स्वयं देवाधिदेव महादेव की देन है। उनका ओंकार मंत्र ॐ का जाप ही सारे शरीर को ऊर्जावान कर देता है और शरीर के फेफड़ों में नई जान भर देता है। विश्वास करे योग को जो मनुष्य अपने जीवन का एक जरूरी अंग बना लेता है तो सामान्य क्या गंभीर बीमारियों से जकड़ा मनुष्य भी सौ साल स्वास्थ्य जीवन गुजार सकता है। योग एक ऐसा माध्यम है कि मनुष्य को ना केवल स्वास्थ्य रखता है बल्कि मानसिक व्याधियों से निजात दिलाता है। योग मनुष्य में शुद्ध सात्विक विचारों का संचार करता है और सारे अवगुणों विसंगतियों से दूर रखता है उनमें सभी से प्रेम करने की ऊर्जा देता है। योग सभी मनुष्यों में एकात्म का भाव जाग्रत करता है जीवन संघर्ष मे मनोबल बनाये रखने में सहायक होता है।
जीवन में अगर योग है
मन काया आपकी निरोग है
योग सनातन की आत्मा है। मैं समस्त विश्व का आव्हान करता हूँ कि आप आज भटके हुए है आइये अपने मूल में वापस लौटे और सनातनी बने क्योंकि सनातन ही मानवीय उत्थान का एक मात्र रास्ता है। जहाँ सनातन नहीं है वहाँ सिर्फ विनाश है जो आपके सामने है। मैं चुनौती देता हूँ कि एकबार आप सनातन को अपनाकर देखे आपका जीवन आपका समाज आपका देश में खुशहाली ना आये तो मैं आपका मत मान लूँगा। मैं अपने जीवन में योग से आये बदलाव को आज आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। मैं पिछले चौदह सालों से किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रहा हूं किंतु सिर्फ योग और प्रभु के औंकार मंत्र ॐ के प्रताप से ना केवल जिंदा हूँ बल्कि सक्रिय जीवन जी रहा हूँ। मैं फिर कह रहा हूँ जो सनातनी नहीं है या जो सनातनी होकर भी सनातनी परम्परा से दूर है वो भटके हुये है और केवल सनातनी परम्परा ओर योग को जीवन अंग बनाकर अपना जीवन सँवार सकते है
धन्यवाद।
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र













