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उम्र

सौंदर्य झरता रहा
उम्र ठहरी नहीं ..
ज़िंदगी पैरों में
कील सी चुभती रही …

एक अरसा दुःख सुख में ख़ुशी ढूंढ़ते ही रहे ..
पर वो ख़ुशी खिड़कियों से
न आई कहीं….

दर्द तो बस दर्द था ..
चंद कमजर्फ़ साँसों
का रुख सर्द था..

बेतरह घूरता रहा
आइना तोड़ कर ..
हिचकियाँ दर्द की
दफ़न हो रहीं …

टूट रहा प्यास था
प्यासे मृग का मगर…
झील के चित्र थे
झील थी ही नहीं…

गीत की गठरियाँ
राह में खो गयी ..
बाँस वन में नहीं
बाँसुरी थी कहीं ….

के वी

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