
संस्कार मनुष्य की सबसे बड़ी पूंजी है। शिक्षा से डिग्री मिलती है, पर संस्कार से इंसानियत मिलती है।
जीवन में हर इंसान कभी न कभी गिरता है। गिरना बुरी बात नहीं है। गिरकर जो संभल जाए, वही असली इंसान है। पर आज सबसे बड़ा खतरा ये है कि इंसान गिरते समय अपने संस्कार भी गिरा देता है।
पैसों के लिए रिश्ते गिर गए, पद के लिए ईमान गिर गया, और स्वार्थ के लिए सच गिर गया। जब इंसान अंदर से गिरता है, तो बाहर से चाहे जितना ऊँचा दिखे, वो खोखला होता है।
संस्कार वो जड़ें हैं जो हमें गिरने के बाद भी संभाल लेती हैं। संस्कार सिखाते हैं – बड़ों का सम्मान करो, सच बोलो, मेहनत से कमाओ, और गिरो तो चोरी से नहीं, संघर्ष से उठो।
अंत में यही कहूंगा – “ऊँचाई छूने से पहले संस्कार मत गिराना, क्योंकि गिरे हुए मकान से ज्यादा गिरा हुआ इंसान खतरनाक होता है।”
- इंसान शरीर से गिरे तो चोट लगती है,
पर संस्कार से गिरे तो चरित्र मर जाता है। - गिरना प्रकृति है, पर गिरकर झूठ बोलना विकृति है।
संस्कार वही जो गिराकर भी सच का दामन न छोड़े। - आज लोग सीढ़ी चढ़ने के लिए दूसरों को गिरा देते हैं।
याद रखो, जिस दिन संस्कार गिर गए, उस दिन इंसानियत भी गिर जाएगी।
पद चला जाए तो फिर मिल जाएगा,
धन चला जाए तो फिर कमा लेंगे,
पर एक बार संस्कार गिर गए ना,
तो इंसान को उठाने वाला कोई नहीं मिलेगा।
इसलिए गिरो, पर गिरकर भी इतने ऊँचे रहो कि लोग कहें –
“ये गिरा जरूर था, पर संस्कारों के साथ उठा है।”
समाज में सबसे खतरनाक गिरावट इंसान की शारीरिक गिरावट नहीं, बल्कि नैतिक गिरावट है। आज हम देखते हैं कि इंसान तकनीक, शिक्षा और पैसों में बहुत आगे बढ़ गया है, पर संस्कारों में लगातार गिर रहा है।
पहले गिरना मतलब सड़क पर गिर जाना था। आज गिरना मतलब झूठ बोलकर आगे बढ़ जाना है। मतलब के लिए रिश्ते तोड़ देना है। कमजोर को दबाकर अपना उल्लू सीधा करना है।
संस्कार कोई किताबी बात नहीं है।
संस्कार है – बड़ों का पैर छूना, सच बोलना, मेहनत की रोटी खाना, और किसी की मजबूरी का मजाक न बनाना।
संस्कार वो ब्रेक हैं जो हमें तेज रफ्तार में गलत मोड़ लेने से रोकते हैं। जिस घर में संस्कार होते हैं, वहां डिग्री कम भी हो तो इज्जत ज्यादा होती है।
इस गिरावट को रोकने के लिए स्कूल में मार्क्स के साथ “मनुष्य” भी पढ़ाना होगा। घर में मोबाइल से पहले माँ-बाप की बात सुननी होगी।
हमें तय करना होगा कि हमें “सफल इंसान” चाहिए या “अच्छा इंसान”। क्योंकि सफलता एक दिन धोखा दे सकती है, पर संस्कार आखिरी सांस तक साथ देते हैं।
आखिर में एक ही बात – मकान गिर जाए तो फिर बन जाता है। पर इंसान एक बार संस्कारों से गिर जाए तो उसे उठाना बहुत मुश्किल हो जाता है।
इसलिए याद रखिए – “ऊँचाई पर पहुंचने की जल्दी में अपने संस्कारों को पीछे मत छोड़ आइए, क्योंकि खाली जेब से ज्यादा खाली चरित्र अभिशाप होता है।”
संस्कार का शाब्दिक अर्थ
संस्कार=सम्+कृ+ण्वुल्
सम्-अच्छी तरह पूर्ण रूप से
कृ-करना
ण्वुल्-भाव
इसलिए
*संस्कार का शाब्दिक अर्थ है
“अच्छी तरह गढ़ना, परिष्कृत करना,
शुद्ध करना”
संस्कार वो गुण और आदतें हैं जो हमें “जानवर” से “इंसान” बनाते हैं।
उदाहरण:
- नमस्ते करना = अभिवादन का संस्कार
- सच बोलना = चरित्र का संस्कार
- मेहनत करना = कर्म का संस्कार
- बड़ों का सम्मान = पारिवारिक संस्कार
एक लाइन में याद रखें
“संस्कार वो गहना है जो इंसान को बाहर से नहीं, अंदर से खूबसूरत बनाता है।”
के वी











