
सात मई अठारह सौ इकसठ ।
बंगाल की धरती धन्य हुई…
क्योंकि उस दिन साहित्य को,
नया स्वर मिला था ।
जोरासांगो के ठाकुर घर में……
एक सूरज उतरा था….
जिसका नाम था__
- रवींद्रनाथ टैगोर *
कलम नहीं थी, उनके हाथों में,
उनके हाथ में वीणा थी ।
जो छुआ, वो गीत बन गई,
जो लिखा, वो प्रार्थना बन गई ।
गीतांजलि केवल पुस्तक नहीं,
प्रार्थना का निर्मल दीप है ।
शांति -निकेतन में उसने,
सपनों का स्कूल बसाया ।
नोबेल सम्मान मिला उन्हें,
फिर भी रहे विनम्र महान।
वे कहते थे __
ये सम्मान मेरा नहीं,
ये मेरे भारत का सम्मान है
पूनम कुमारी
मधुबनी बिहार











