
सुखदेव राजगुरु भगत जैसे,थे आज़ादी के परवाने।
कर गए हिन्द का सर ऊंचा,ये हिंदुस्तान के दीवाने।
लड़ गए अज़ादी की खातिर,अपनी खुशियां सब भूल गए।
भारत के बहादुर धीर वीर, हँस कर फांसी पर झूल गए।
होठों पे था बस इंकलाब,भारत के लिए दिल मरता था।
ले जान हथेली पर फिरते,दुश्मन से कोई न डरता था।
आज़ाद कराया हिंदोस्तां,फिर गुलामी जंजीरों से।
भयभीत हुए गोरों से न,गर्दन पे लटकी शमशीरों से।
कहता है कौन कि मिट गए वो,हर दिल के वो वाशिंदा हैं।
देशप्रेम को दिल में जला,रग रग में आज भी जिंदा हैं।
भर इंकलाब की ज्वाला मन में,प्रतिशोध बहुत था हुआ भरा,
थे लड़े कि जब तक जिंदा थे,भयभीत नहीं वो हुए जरा।
अलबेले थे मतवाले थे,वो शेर-ए-हिंदुस्तान थे।
थे क्रांतिकारी साहसी बहुत,वे भारत की पहचान थे।
अपने विचारों से प्राणों से,हर दिल में अलख जगाया था।
अरु क्रांतिकारीमय नारों से,गोरों को दूर भगाया था।
तुम अपने देश से प्रेम करो,है सीख सभी को देती हैं।
इनके शौर्य की गाथाएं,जीवन को राह नई देती हैं।
हम को जो मिल रही आज खुशी,उनकी ही बदौलत है पाया।
आओ उनका हम ध्यान करें,यह पुण्य दिवस फिर है आया।
इन अमर शहीदों के ऋणी हैं हम,कैसे ऋण मुक्त हो पाएंगे।
रखेंगे याद शहादत को,दिल से न इन्हें भुलायेंगे।
रखे देश से प्रेम सदा,माटी से दूर न जाना है।
हम भारत की संताने हैं,भारत में ही मिट जाना है।
आओ देकर पुष्पांजलि,श्रद्धा से उन्हें हम याद करें।
भूले न शहादत को उनकी,हम उन्हें नमन शत् बार करें।
अनुजा दुबे ’पूजा’
स्वरचित/अप्रकाशित
वरुण, महाराष्ट्र













