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ग़ज़ल


कोई साथ हमारे कब तक।
जीवन और सहारे कब तक।

रात ढ़ले ही छुप जाएंगे,
नभ में चाँद,सितारे कब तक।

तय है वक़्त बहारों का भी,
धरती रूप सँवारे कब तक।,

हम रखते हैं जीत का सपना,
कोई हमसे हारे कब तक,

जिनकी चाहत है मतलब की,
उनके आप दुलारे कब तक।

आदत है जिनकी देरी की,
उनकी राह निहारे कब तक।

बूढ़ी, धुंधली आँखों में अब,
सपने, आब ,नज़ारे कब तक।

नवीन माथुर पंचोली

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