
आंखें पथरा जाती हैं
बाट देख-देख
जिंदगी निकल जाती है यूंही
क्या ये है विधि का लेख
किसी पर किया था जो विश्वास
भ्रमित मन कहे– वो है यहीं कहीं आस-पास
ऐसे भी
जग में बंधन होते हैं
जो बंधे हैं आशा की डोर
एक दिन आएगा वो
लगी हैं आंखें जिसकी ओर
पूरे होंगे दिली ख्वाब
पर नहीं मिलता कोई जवाब
बस जिया न माने
लोग कितना भी कहें पर मन न माने
ये मन गोपिका बन …बस करे प्रतीक्षा
बीत जाए ज़िंदगी
नयनों में मिलन की जगी रहे आस
मन से जुड़ा है एक अटूट विश्वास
प्रेम की डोर संग चले श्वास
जिंदगी निकल जाए तमाम
अधीर ये मन
प्रतीक्षा में जलता रहे
जब तक तन अटके हैं प्राण
आशा तब तक जगी रहे
जग से न हो जाए प्रस्थान
पुनर्जन्म हो
लौट-लौट आये फिर से इस मृत्युलोक
है उस नियंता की ये माया
जीव फिरे भरमाया
जहां बिछा मिले एक वितान
तीर्थ में ढूंढ-ढूंढ थक जाए
कहीं राधा रूप में कहीं बने हैं घनश्याम
वो आज नहीं तो कल मिलेंगे…. जो हैं अंतर्ध्यान !
जीवात्मा को कहां विश्राम।
महेश शर्मा- करनाल













