
स्वाभिमान मनुष्य का, सबसे सुंदर मान।
झुकना केवल सत्य पर, यही हृदय की शान।।
धन-दौलत से बढ़कर होता, आत्मगौरव प्यारा।
स्वाभिमानी जन के आगे, फीका जग सारा।।
अन्यायों के सम्मुख जिसने, शीश कभी न झुकाया।
सच्चाई की राह पकड़कर, जीवन सफल बनाया।।
स्वाभिमान हो साथ तो, साहस बढ़ता जाए।
कठिन समय में भी इंसान, अपना धर्म निभाए।।
नहीं चाहिए झूठी शोहरत, न सम्मान उधारा।
मेहनत से अर्जित यश ही, लगता सबसे प्यारा।।
अपनी मेहनत पर विश्वास रख, आगे कदम बढ़ाएँ।
दूसरों के अधिकारों का, हम भी मान बढ़ाएँ।।
स्वाभिमान का अर्थ नहीं है, करना किसी को नीचा।
सबका सम्मान करें मिलकर, भाव रहे मन सींचा।।
आत्मसम्मान की ज्योति सदा, मन में जलती रहे।
सत्य, न्याय और नेक राह पर, जीवन चलता रहे।।
झुक जाएँ हम प्रेम के आगे, यह कमजोरी नहीं।
सच्चाई पर अडिग रहना, इससे बढ़कर बात नहीं।।
स्वाभिमान से जीना ही तो, जीवन की पहचान।
जिसके मन में आत्मगौरव, उसका ऊँचा मान।।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार













