
सफ़र कभी नाम बन गया,
कभी सफ़र काम बन गया।
कभी सफ़र संगति बन गया,
तो कभी-कभी सफ़र साथी बन गया।
कभी राहों ने मंज़िल से मिलाया,
कभी मंज़िल ने नई राह दिखाई।
हर मोड़ पर कुछ नया मिला,
हर सफ़र ने एक नई कहानी बनाई।
क्योंकि सफ़र सिर्फ़ रास्ता नहीं,
सफ़र एक एहसास है
जो हर कदम पर साथ चलता है।
सफ़र ने मंज़िल तक पहुँचाया तो ज़रूर,
मगर मंज़िल ने अपनाया ही कहाँ।
हर बार मंज़िल की ओर ले गया सफ़र,
लेकिन हर बार नई मंज़िल ने
रास्ता भुलाया।
शायद यही दस्तूर है सफ़र का
मंज़िल मिलती है,
मगर सफ़र कभी ख़त्म नहीं होता।
क्योंकि असली कहानी मंज़िल की नहीं,
सफ़र की होती है।
आर एस लॉस्टम













