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हर हर महादेव

भस्म रमाए, जटा में गंगा, चंद्र सुशोभित भाल,
काल भी जिनसे काँप उठे, ऐसे हैं शंभु त्रिकाल।

विष को पीकर जग बचाया, नीलकंठ कहलाए,
दीन-दुखी की एक पुकार , प्रभु दौड़े चले आए।।

पुष्प चंदन धूप दीप ,जो भी भक्त प्रेम से ध्यावे
एक लोटा जल श्रद्धा से ,प्रभु करते सब स्वीकार।।

डमरू की धुन में सृष्टि गूँजे, तांडव में विस्तार,
संहारक भी, सृजनकर्ता भी, तुम ही हो आधार।

कैलाशों की शीतल चोटी, मन का परम निवास,
जिसने “शिव” को हृदय बसाया, मिटा गया संताप।

ना सोने का सिंहासन चाहूँ, ना वैभव का मान,
चरणों की बस धूल मिल जाए, यही रहे अरमान।

हर श्वासों में “ॐ नमः शिवाय”, हर धड़कन में नाम,
जीवन मेरा सफल हो जाए ,जब दर्शन पाऊ तेरे धाम ।।

हर हर महादेव!

आशी प्रतिभा
मध्य प्रदेश ग्वालियर

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