
राह वही बस चाल नई है।
मंज़िल की पड़ताल नई है।
मांगें सालों – साल पुरानी,
बस उनपर हड़ताल नई है।
मुमकिन है बच जाना उसका,
हाथ में उसके ढाल नई है।
बजता है सुर ताल में अपनी,
उस तबले की ख़ाल नई है।
ख़ुश है आज शिकारी ख़ुद से,
उसने डाली जाल नई है।
सोच,संभल कर चढ़ना उस पर,
जो ऊंची वो डाल नई है।
—-नवीन माथुर पंचोली













