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लड़की से नारी, नारी से माँ तक का सफ़र


वह कभी एक नन्ही-सी लड़की थी,
जिसकी आँखों में सपनों का आकाश था,
हथेलियों पर तितलियाँ थीं,
और मन में बेफिक्र बचपन का उल्लास था।

फिर समय ने धीरे से उसके कंधों पर,
जिम्मेदारियों का स्पर्श रख दिया,
खिलखिलाती उस बच्ची को,
जीवन ने नारी होना सिखा दिया।

कल तक जो,
पिता की उँगली पकड़कर,
दुनिया की राहों पर चलती थी,
आज वही अपने निर्णयों की राह चुनती है,
कभी मुस्कुराती है,
कभी भीतर ही भीतर जलती है।

लड़की से, नारी बनने का सफ़र,
केवल उम्र बढ़ने का नाम नहीं,
यह तो अपने सपनों को समझने,
अपने अस्तित्व को पहचानने का मुकाम है।

वह रिश्तों को सहेजती है,
कभी बेटी बनकर,
कभी बहन बनकर,
कभी पत्नी बनकर,
जीवन की धूप में,
किसी के लिए छाँव बन जाती है।

और फिर एक दिन—
उसकी हथेलियों में एक नन्ही-सी हथेली आती है,
उसकी धड़कनों में,
किसी और की धड़कन बस जाती है,
उसकी आँखों में अपने लिए नहीं,
किसी और के भविष्य के सपने पलने लगते हैं।

यहीं से नारी का एक और रूप जन्म लेता है—माँ।

माँ बनना केवल एक संबंध पाना नहीं,
अपने भीतर एक पूरा संसार बसाना है।
अपनी नींद से पहले,
किसी और की नींद सोचना,
अपनी खुशी से पहले,
किसी और की मुस्कान देखना,
अपने हिस्से की थकान छिपाकर,
बच्चे के माथे पर सुकून रख देना है।

जिस नारी ने कभी स्वयं सहारे की तलाश की थी,
वही किसी और का सबसे मजबूत सहारा बन जाती हैl
जिसने कभी माँ की गोद में सुरक्षा पाई थी,
वही आगे चलकर किसी के लिए पूरी दुनिया बन जाती है।

उसका बचपन पीछे छूट जाता है,
पर उसकी मासूमियत पूरी तरह नहीं जाती;
वह अपने बच्चे की हँसी में,
फिर से,
अपना बचपन खोज लेती है।

उसकी आँखों में अब केवल सपने नहीं होते,
उन सपनों की जिम्मेदारी भी होती है।
उसकी मुस्कान में केवल खुशी नहीं,
कई अनकहे त्यागों की कहानी होती है।

लड़की से नारी,
और नारी से माँ बनने तक—
यह सफ़र किसी एक दिन में पूरा नहीं होता,
यह तो हर दिन थोड़ा-थोड़ा
बदलने,
थोड़ा-थोड़ा सँवरने,
और हर परिस्थिति में स्वयं को मजबूत करने का नाम है।

वह टूटती भी है,
मगर बिखरती नहीं;
थकती भी है,
मगर रुकती नहीं।

कभी बेटी बनकर घर की रौनक होती है,
कभी पत्नी बनकर जीवन की सहभागी,
और माँ बनकर—
वह किसी के पूरे अस्तित्व की पहली पाठशाला बन जाती है।

उसके आँचल में केवल ममता नहीं,
एक पीढ़ी का भविष्य पलता है।उसकी लोरी में केवल संगीत नहीं,
एक जीवन को संस्कार देने की शक्ति होती है।

इसलिए लड़की से नारी,
और नारी से माँ बनने का सफ़र,
सिर्फ़ शरीर या उम्र का परिवर्तन नहीं—
यह ममता, त्याग, साहस, संघर्ष और आत्मबल से,
एक स्त्री के पूर्ण होने की अनवरत यात्रा है।

वह पहले किसी की बेटी थी,
फिर किसी की अपनी बनी,
और अंततः किसी की माँ बनकर, अपने भीतर की पूरी दुनिया बाँट देती है।

शायद इसी का नाम नारी है—

पूनम कुमारी
मधुबनी (बिहार)

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