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युवा – उड़ान

विधा : कविता


संभल जाओ राष्ट्र के गद्दारों ,
सुन ले अब खोल के कान ।
पूरे न होंगे तेरे कोई मंसूबे ,
ले चुके अब ये युवा उड़ान ।।
बहुत ही की है गद्दारी तुमने ,
राष्ट्र को अब है सहन नहीं ।
बहुत सहा हमारा ये भारत ,
चिंतन अबतक गहन नहीं ।।
पक चुके हम देखते सुनते ,
पूरे न होंगे तेरे ये अरमान ।
संभल जाओ देश के गद्दारों ,
सुन ले अब खोल के कान ।।
भारत है भारतवासियों का ,
गद्दारों का है समावेश नहीं ।
अपनी दाल कोई पका ले ,
भारत कोई अवशेष नहीं ।।
निष्ठा से देशभक्ति है होता ,
सुन ले तू भी देकर ध्यान ।
संभल जाओ देश के गद्दारों ,
सुन ले अब खोल के कान ।।
तेरे जैसे बहुत हुए हैं चुगले ,
दे सकते न भारत को मात ।
जिनकी तू चरण है चूमता ,
सीमा पर भी सेना तैनात ।।
नहीं चलेगी तेरी ये धूर्तता ,
मिटा न सकोगे राष्ट्र मान ।
संभल जाओ देश के गद्दारों ,
सुन ले अब खोलके कान ।।

अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।

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