
वो वैभव नहीं वैराग्य जीता है
वो अमृत नहीं जहर पिता है
वो घर व संसार में नहीं श्मशान मैं रहता है
अलख निरंजन का अखाड़ा अलग हि दास्तां कहता है
तब हि वो देव नहीं महादेव कहलाता
सुर नर मुनि यक्ष गंधर्व किन्नर असुर भुत पिशाच का वो आराध्य बन जाता
ओम् त्रिदलं त्रिगुणाकार त्रिनेत्रं च त्रिधायुधम्
त्रिजन्मपापसंहारं एक बिल्वं शिवार्पणं त्रिशुलधारिणे प्रसीद प्रसीद महादेव
जटा में गंगा, माथे चंदा, गले में काल का फंदा
हाथ में त्रिशूल, डमरू की ध्वनि, तांडव में ब्रह्मांड का स्पंदन
न भोग का भूखा, न मोह का बंधन
जो भी आया द्वार, खाली हाथ न लौटाया
विष पिया जगत के खातिर, नीलकंठ नाम कमाया
दैत्यों को भी दिया वरदान, भक्तों का दुःख मिटाया
वैरागी होकर भी सबसे बड़ा गृहस्थ कहलाया
जिसे कोई न पूछे, उसे गले लगाता है
जो सबसे टूटा हो, उसी को अपना बनाता है
इसीलिए तो गोपल जाटव ‘विद्रोही’ भी उसी के दरबार में आता है
क्योंकि ज़ख्मों का मरहम सिर्फ महादेव के पास पाता है
बम बम बोले, त्रिनेत्रधारी, कैलाशपति अविनाशी
एक बार जिसने नाम लिया, वो हो गया सन्यासी
न माँगता धन, न माँगता राज्य, माँगता बस एक बात
“हे भोलेनाथ, हर ठोकर के बाद हौसला दोगुना रखना साथ”
गोपाल जाटव विद्रोही खड़ावदा,तह. गरोठ जिला मन्दसौर म.प्र भारत देश












