
सावन की झरती बूँदों में सिहरन का अहसास लिखूँ,
या प्रेयसी के पाँवों में खनकती पायल की झंकार लिखूँ।
कान्हा के प्रेम की दोनों दीवानी—एक राधा, एक मीरा रानी,
मैं वंशी की मधुर तान लिखूँ या अटूट भक्ति की शान लिखूँ।
तपती धूप का अंत हुआ अब, मन में नई उमंग जगी,
सावन की बहार लिखूं या रिमझिम रिमझिम फुहार लिखूं।
स्वागत करने को बाग-बगीचे सज गए गुलाबी कलियों से,
प्रकृति का उपहार लिखूँ या प्रेमी युगल का अरमान लिखूँ।
वृक्षों में हरियाली आई, नदियाँ करतीं कल-कल-कल,
पहाड़ों का सौंदर्य लिखूँ या झरनों की निर्मल धार लिखूँ।
मचलते नयन, छलकता यौवन, बलखाती कमर की चाल लिखूँ,
या उसके कानों की बाली, होंठों की लाली या मेहँदी की लाल लिखूँ।
हवा के झोंके से जब उसकी जुल्फों की खुशबू आती है,
मैं उसका श्रृंगार लिखूँ या उससे मिलने की चाह लिखूँ।
कोयल की मीठी कुहुक से मन की चंचलता बढ़ जाती है,
काले मेघों का बखान लिखूँ या मोर की मतवाली चाल लिखूँ।
हरी चूड़ियों की खनक लिखूँ या धड़कते दिल की आह लिखूँ,
या सावन में सजते-सँवरते उसके रूप का निखार लिखूँ।
सखियों संग बागों में उसके झूला झूलने की अदा लिखूँ,
या प्रेमी की राह तकती प्रेमिका की विह्वल पुकार लिखूँ।
बादल गरजें, बिजली चमके, मन में उठे प्रेम की तरंग,
सावन का मधुमास लिखूँ या अधरों पर ठहरा प्यार लिखूँ।
भीगी-भीगी रातों में जब चाँद भी बादलों में छिप जाए,
मैं उसकी यादों में खो जाऊँ या मिलने का इंतज़ार लिखूँ।
रवि भूषण वर्मा
राँची झारखंड













