
जिस डाल के फुल पर माली की नजर नहीं पड़ी,
इतराते हुए नाचे घड़ी घड़ी,
उस डाली के फुल को माली ने नहीं तोड़ा ,
या फिर भुल वस से फुल को छोड़ा,
फुल ने सोचा कि अरे वाह खुब नाचा जाएं
आज तो बच गए,
गुरु खुब जश्न मनाया जाए,
पास ही की कलियां,
मुस्कुराई,
अरे वाह यार तुम तो बहुत खुश नजर आ रहे हो भाई,
फुल ने तन कर खड़ा होकर जवाब दिया ,
मुझे तो ख़ुदा क़सम,माली ने बख़्श दिया,
यह मेरा रंग देखो यह रूप देखो और यह जो सुंदर प्रस्तुति है ,
आज तो कौन सा जन्म दिन कौनसी प्रार्थना, आज कौनसी स्तुति है,
मेरी सुगंध से सुवासित पुरवाई की महक लाजवाब देखो,
मैं बगिया की शान हुं मेरी नज़ाकत देखो
दूसरे तीसरे दिन सुबह सुबह जब कलियां सारी खिल उठी,
सभी कलियां भोर की पहली किरण में महक उठी ,
और उधर जो लाजवाब ग़ुलाब चेहरा लटकाए हुए मुरझाया हुआ था,
रौनक ए महफ़िल गुल थी उसकी,
तबीयत ठीक नहीं थी गुलशन के गुल की,
वो अंतिम सांस पर अटका हुआ था,
वो निर्थक जीवन को कोसता हुआ था,
लोग ताज़े ताज़े
फुलों को भगवान के चरणों में चढ़ाते हैं
फुलों को चुन चुन कर तोड़ते हैं,
तैयार कर पसंद करते है,
माला के लिए जोड़ते हुए हैं,
और सामने अनगिनत फुलों से उसे कहा कि
मेरा घमंड दो दिनों का यही दुर्भाग्य है मेरा यहां
एक खिले हुए फूलों तुम मंदिर जाओ महफ़िल जाओ,मन बहलाओ,
आप जैसा मैरा सौभाग्य कहां,
पास के फुलों ने कहा कि समय की मार से सभी को टूटते हुए देखा है
हमने खिले हुए फूलों को डाली पर ही बिखरते देखा है,
दुसरों के काम नहीं आने वालों को पांवों के नीचे कुचलते हुए देखा है,
जिंदगी मिलना फुलों सा खिलना नियामत है,
और किसी के काम आना मुकद्दर है इंसानियत है,
उन फुलों की किस्मत है,
वाह भाई क्या नज़ाकत है,
जो कभी भी काम में आ जाते है ,
वो लोग किस्मत वाले होते हैं
जो नज़रें चुरा कर जीते हैं,
वो निर्थक जीवन जीते हैं,
यहि तो है जिंदगी
कि हम सभी एक दुसरे
के लिए खिलते हैं
कभी हमारी हिफाजत है,
तो कभी हमारी हिमायत है,
कभी हिदायत है,
तो
कभी रियायत है,
यहि वो कुदरत की जादूगरी है,
कुदरत का हि सब करिश्मा है ,
हर काम कुदरत की इबादत है।।
अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)












