
दिनांक : 13 अगस्त , 2026
विधा : पद्य
बेशक घर यहाॅं मड़ई टाटी ,
मिलजुल रहने की परिपाटी ।
बेशक गरीबी अथाह यहाॅं ,
किंतु भारत की पावन माटी ।।
गरीबी यहाॅं अथाह लेकिन ,
प्रेम निष्ठा यहाॅं पे परिपूर्ण है ।
रखता मन निज जो कपट
उसकी मनसा यहाॅं चूर्ण है ।।
हम भारतवासी भोले भाले ,
किंतु मन के नहीं हम काले ।
प्रकाश में रहना सीखा हमने ,
जग को भी हम देते उजाले ।।
यह अपने मुख बडाई नहीं ,
कोई क्षतिपूर्ति भरपाई नहीं ।
सबको हम समतुल्य बनाते ,
खोदे कहीं हम ये खाई नहीं ।।
अथक परिश्रम हम करते हैं ,
परिजन का पेट हम भरते हैं ।
न कालाबाजारी न चमचई ,
नहीं किसी से हम तो डरते हैं ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।












