
प्रस्तावना: एक माला, पाँच मोती और एक धागा
भारत का इतिहास कोई साधारण इतिहास नहीं है। यह ऋषियों की तपस्या, वीरों का बलिदान, संतों का प्रेम और साहित्यकारों की संवेदना से बुना हुआ महाकाव्य है। इस महाकाव्य के हर पन्ने पर हमें एक ही संदेश मिलता है – व्यक्ति से बड़ा राष्ट्र है।
अगर हम भारत की 5000 साल की यात्रा को एक माला मानें, तो उस माला में अनगिनत मोती हैं। पर उनमें से पाँच मोती ऐसे हैं जो सबसे अधिक चमकते हैं। इन पाँच मोतियों को एक ही धागे ने पिरोया है – और वो धागा है राष्ट्रभक्ति।
पहला मोती है कलम। लोकमान्य तिलक की कलम ने सोए हुए भारत को जगाया।
दूसरा मोती है बंदूक। चंद्रशेखर आज़ाद की बंदूक ने गुलामी की जंजीरें तोड़ीं।
तीसरा मोती है भजन। संत टेऊराम के भजन ने बंटवारे से घायल समाज को सहारा दिया।
चौथा मोती है कहानी। मुंशी प्रेमचंद की कहानी ने महलों को झोपड़ी का दर्द दिखाया।
पाँचवाँ मोती है तिरंगा। कारगिल के वीरों ने अपने लहू से तिरंगे की लाज बचाई।
आज जब हम विश्वगुरु बनने की ओर बढ़ रहे हैं, तब इन पाँच स्वर्णिम अध्यायों को याद करना जरूरी है। क्योंकि जड़ें मजबूत होंगी तभी वृक्ष ऊँचा जाएगा।
1. लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक: स्वराज का शंखनाद
23 जुलाई 1856 को रत्नागिरी में जन्म। BA, LLB करके वकालत छोड़ देश की वकालत करने लगे। 1896 में नारा दिया – “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा।” केसरी अखबार से अंग्रेजों को ललकारा। गणपति उत्सव और शिवाजी उत्सव को सार्वजनिक करके जन-आंदोलन बनाया। 1908 में 6 साल मांडले जेल गए, वहीं गीता रहस्य लिखी। 1916 में होमरूल आंदोलन चलाया। 1 अगस्त 1920 को निधन। गांधीजी ने कहा – “आधुनिक भारत के निर्माता”। तिलक ने सिखाया कि आज़ादी मांगने से नहीं, जागने से मिलती है।
2. शहीद चंद्रशेखर आज़ाद: मौत को भी जिसने आज़ाद कर दिया
23 जुलाई 1906 को भाबरा में जन्म। 14 साल में असहयोग आंदोलन में कूदे। जज के सामने बोले – नाम आज़ाद, पिता स्वतंत्रता, घर जेल। HSRA के कमांडर-इन-चीफ बने। काकोरी कांड 1925, सांडर्स वध 1928, असेंबली बम कांड 1929 की योजना बनाई। 27 फरवरी 1931 को अल्फ्रेड पार्क में 300 पुलिसवालों से अकेले लड़े। आखिरी गोली खुद को मारी। प्रण था – “जिंदा अंग्रेजों के हाथ नहीं आऊंगा।” उम्र सिर्फ 24 साल। आज वो पार्क चंद्रशेखर आज़ाद पार्क है।
3. संत टेऊराम जी महाराज: बंटवारे के जख्म पर प्रेम का मरहम
1887 में सिंध में जन्म। प्रेम प्रकाश मंडल बनाया। “अजो झुलेलाल, थिंदा बेड़ा ही पार” का नारा दिया। 1947 में बंटवारे के बाद लाखों सिंधियों के साथ अजमेर आए। कहा – “धर्म बदला है, धरती नहीं। हम भारत के थे, भारत के हैं।” नसीराबाद आश्रम बनाकर शिक्षा, नशा-मुक्ति और कन्या विवाह के काम किए। सिखाया – “सादा जीवन, उच्च विचार।” हर चेटीचंड पर लाखों श्रद्धालु इनके धाम आते हैं।
4. मुंशी प्रेमचंद: कलम के सिपाही
31 जुलाई 1880 को वाराणसी के लमही गांव में जन्म। असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव। पहले उर्दू में नवाब राय नाम से लिखते थे। 1907 में सोजे वतन किताब जब्त हुई तो प्रेमचंद नाम रख लिया।
गोदान में होरी का दर्द, गबन में रमानाथ का लालच, ईदगाह में हामिद का त्याग दिखाया। 300 से ज्यादा कहानी, 14 उपन्यास लिखे। 1910 में सरकारी नौकरी छोड़ दी क्योंकि अंग्रेज चाहते थे कि लिखना बंद करो। प्रेमचंद बोले – “पेट के लिए कलम नहीं बेचूंगा।” 8 अक्टूबर 1936 को निधन। प्रेमचंद ने सिखाया कि सच्चा साहित्य वही है जो गरीब की झोपड़ी तक पहुंचे।
5. कारगिल विजय दिवस: तिरंगे की लाज रखने वाले जवान
26 जुलाई 1999 को भारत ने ऑपरेशन विजय में कारगिल की चोटियों पर फिर तिरंगा फहराया। पाकिस्तानी घुसपैठियों ने 18000 फीट ऊंची पहाड़ियों पर कब्जा कर लिया था। कैप्टन विक्रम बत्रा ने कहा “ये दिल मांगे मोर”, कैप्टन मनोज पांडेय सिर में गोली लगने के बाद भी लड़े। 60 दिन की लड़ाई में 527 जवान शहीद, 1363 घायल हुए। ताकि 130 करोड़ लोग चैन से सो सकें।
उपसंहार: एक धागे में बंधे पाँच मोती
तिलक ने जगाया, आज़ाद ने लड़ना सिखाया, टेऊराम ने जोड़ना सिखाया, प्रेमचंद ने जगाना सिखाया, कारगिल के जवानों ने निभाना सिखाया। एक ने कलम दी, दूसरे ने बंदूक, तीसरे ने माला, चौथे ने कहानी, पाँचवें ने तिरंगा।
एक शिक्षक के रूप में मैं अपने छात्रों को भी यही 5 मूल्य सिखाती हूं – तिलक से जागरूकता, आज़ाद से देशभक्ति, टेऊराम से समरसता, प्रेमचंद से संवेदना और जवानों से अनुशासन। तभी हमारा भारत सच में विश्वगुरु बनेगा।
जय हिंद। जय भारत। जय झुलेलाल।
स्व-प्रमाणन पत्र
यह प्रमाणित किया जाता है कि यह निबंध “त्याग, तप, तिरंगा और कलम: भारत के पाँच स्वर्णिम अध्याय” मेरे द्वारा स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित रचना है।
इसमें वर्णित समस्त तथ्य प्रमाणिक स्रोतों पर आधारित हैं। भविष्य में यदि इसकी मौलिकता के संबंध में कोई आपत्ति होती है तो उसकी सम्पूर्ण जिम्मेदारी मेरी होगी।
श्रीमती ध्वनि आमेटा शिक्षिका सागवाड़ा डूंगरपुर













