
जगत में भाव बिन मिले प्रेम कहां।
प्रेम है तो भव्यता के दर्शन हों वहां।
प्रेम हो समरसता सरसावे पूरे जहां।
सत्य-भाव बिन न मिले प्रेम पनाह।
प्रेम भाव हिय में प्रकृति को रास।
तब वाणी में कोमलता का हो वास
सत्य जल हो प्रवाहित प्रेम सलिला
आत्माएं तृप्त हिय प्रेम पुष्प खिला।
भावालंकार रस काहे काव्य उदास।
खिलें तब काव्य में पुष्प-पलाश।
प्रेम-पुष्प सुगंध जग, हिय उपजाए।
प्रेमवल्लरी की भव्यता जग हर्षाए।
लिपट-लिपट प्रेम पुष्प वो बरसाए।
भृंग, खग सभी के मन को हर्षाए।
प्रकृति धरा पे प्रेम अर्थ समझाए।
प्रेम बिन काव्य भाव लहर न पाए।
प्रिय दूर नहीं सत्य प्रेम भाव हैं जहां।
प्रेम सरिता प्रवाहित मनोल्लास वहां।
बुद्धि चले प्रेम संग हिय को दे घात।
प्रेम भाव में बुद्धि का न निभे साथ।
बुद्धि चले हृदय की कोमलता हर ले।
सत्य प्रेम ही हृदय में भक्ति भर दे।
बुद्धि खडग सम भावों पर करे प्रहार।
जगजीवन में प्रेमोदगार ही अमृतधार।
पशु-पक्षी प्रेम की भाषा करें महसूस।
सत्य प्रेम भाव से वे भी हों अभिभूत।
प्रेम बिन न प्रिय, प्रेम प्रणय आधार।
प्रेम बिन न जीवन, ये जगत निस्सार।
आत्मा प्रेम के वशीभूत हर जन्म मिले वही स्वरूप।
प्रेम दिव्य सुगंध अनूप, प्रेम बंधन सम न कोई रूप।
राधा प्रेम कन्हैया है वृंदावन,बसा जगत के तन-मन।
लगी है भीड़ तडपत मन,जन्म-जन्म अनश्वर मिलन।
महेश शर्मा, करनाल













