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रेशम की डोरी

श्रावण पूर्णिमा आई, बहना राखी लाई,
सजी थाल में दीप जले, खुशियाँ संग मुस्काई।
रोली-अक्षत सजे, प्रेम से तिलक लगाया,
भाई ने भी बहना को सुंदर उपहार दिलाया।

रेशम की डोरी में स्नेह, विश्वास समाया,
भाई ने रक्षा-वचन देकर रिश्ता और निभाया।
आँखों में खुशियाँ झलकीं, मन में प्यार उमंग,
मिलकर दोनों ने बाँटे, रिश्तों के मधुर रंग।

राखी केवल धागा नहीं, भावों की पहचान,
भाई-बहन के प्रेम का यह पावन अनुपम मान।
यम-यमी की पावन कथा, कृष्ण-द्रौपदी की प्रीति,
रक्षा-सूत्र सदा सिखाए, सच्चे प्रेम की रीति।

घर-आँगन महका-महका, छाई मधुर बहार,
सुखी रहे हर भाई-बहना, यही हृदय की पुकार।
रिश्तों में विश्वास रहे, स्नेह रहे भरपूर,
रक्षाबंधन का पर्व करे, हर मन को प्रेम से चूर।


डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार

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