
बहना-भैया प्रीत का,आया पावन पर्व,
नींव जहाँ विश्वास की,करते दोनो गर्व।
करते दोनो गर्व,नेह का बंधन प्यारा,
भ्रात,बहन की आँख,बसे बन चंदा तारा।
जियो हजारों वर्ष,बहन का होता कहना,
सदा निभाना साथ,कहे भैया से बहना।
सावन लेकर आ गया,राखी का त्यौहार,
घर आँगन में छा गया,भ्रात बहन का प्यार।
भ्रात बहन का प्यार,लिए थाली है आई,
मन में भरकर प्रीत,बहन राखी है लाई।
कह ’पूजा’यह साथ,बड़ा ही निर्मल पावन,
करती पीहर याद,बहन जब आता सावन।
रोली अक्षत हाथ ले,तिलक लगाए माथ,
रक्षा बंधन बाँधती,बहन भ्रात के हाथ।
बहन भ्रात के हाथ,हटाती सभी बलाएं,
खूब जियो हे भ्रात ,मांगती यही दुआएं
भाई की मुस्कान,भरे है अपनी झोली,
और नही कुछ चाह, लगाती मस्तक रोली।
अनुजा दुबे ’पूजा’
स्वरचित/मौलिक
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वरुण, महाराष्ट्र












