दुनियाँ मेरी हँसी देखती है इन हँसी में छिपे आँसू नहीं
बह ना जायें रोकता हूँ पूरे तसव्वुर से
जो बह गये तो सैलाब आयेगा
ये मंजर दुनियाँ का पल में तबाह हो जायेगा
लाख जख्म जमाने में एक जमाने से खायें है
बिना रोयें बिना चिल्लाएं ही जख्म सीने में दबाये है
एक काँधे को हम तरस गये
अपनों के बीच ही अपने पलट गये
बतायें किसको ज़बाँ ही दगा दे गई
समझने को एक दिल की कमी हो गई
यहाँ सब जख्मी है मलहम कोई लगाता नहीं
क्या करें कैसे करें जख्म कोई सहलाता नहीं
अब तो आदत हो गई ज़ख्मों के साथ जीने की
तन्हाई में खुद को ही सहेजने की
कोई फ़रिश्ता आयेगा नहीं बिगड़े को सँवारने वास्ते
खुद ही गिरना खुद ही लड़खड़ाना सामने दुरूह रास्ते
रब से नेमत नहीं मुक्ति माँगते है
जीने की नहीं मरने की शक्ति मांगते है
तेरी दुनियाँ में अब जीने की कोई ख्वाहिश ना रही बाकी
अश्कों के मजमे में अब कोई इबादत ना रही बाकी
कयामत के एक रोज सवाल होगा मेरा तुझसे ए खुदा
क्यों गर सुकून ताजिंदगी रहा मुझसे ही यूँ खफ़ा खफ़ा
शिकवे भी है शिकायत भी कम नहीं है
जीने मरने के ऊसूल दर रिवायत अब ग़म नहीं है
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र













