
हरिगितिका छंद
हो रही थी घनघोर वर्षा,थी रही बिजुरी डरा,
वातावरण था रात का तब,अंधकारों से भरा।
जो रात आई अष्टमी की,शुभ शगुन होने लगे,
सोने लगे प्रहरी सभी जो,कर रहे थे रतजगे।
जनम कारावास में कान्हा,का जब हुआ अरु तभी,
बेड़ियां पाँवो की खुल गई,खुल गए ताले सभी।
संतान को अपनी बचाने,वसुदेव उठकर खड़े,
सोये थे कान्हा जी जिसमे,टोकरी ले चल पड़े।
लेकर बढ़े वसुदेव आगे,नगर मथुरा को चले,
यमुना रही थी चरण को छू,नाग की छाया तले।
हर्षित यशोदा हो उठी ले,गोद कान्हा को फिरे,
नंदबाबा भए आनंदित,ग्वाल बालों से घिरे।
लेकर मनुज अवतार श्री ने, अंत पापों का किया,
कर्म का देकर संदेश अरु,ज्ञान गीता का दिया।
लेकर धरा पर जनम प्रभु ने,धर्म की स्थापना की,
धर्म ऊँचा ये सनातन का,रहे यह कामना की।
अनुजा दुबे ’पूजा’
पूर्णतः मौलिक
वरुण, महाराष्ट्र













