
कुछ ज़ख्म जिस्म पर नहीं, दिल पर होते हैं,
कुछ दर्द लफ्जों में नहीं, आँखों में होते हैं।
हम हँसते हैं सिर्फ ज़माने के लिए,
वरना रातों में तो सिर्फ हम रोते हैं।
जिसे अपना समझा वही बेगाना निकला,
जिसे दिल दिया उसी ने दिल तोड़ा है।
हाथ थाम के जो कहता था साथ हूँ,
उसी ने बीच सफर में हाथ छोड़ा है।
अब किसी से कोई शिकायत नहीं रही,
खुद से बस इतना सा वादा किया है।
जो जैसा है उसे वैसा ही रहने देंगे,
अब दिल किसी से ज्यादा नहीं लगाना है।
सबको खुश रखते-रखते खुद ही रूठ गए,
अपनी खुशी का तो हिसाब ही भूल गए।
जो दिल के करीब थे वो दूर हो गए,
अब इस दिल में किसी का ख्वाब नहीं है।
थक गए हैं सबको समझाते-समझाते,
खुद को ही नहीं हम समझा पाए हैं।
जमाना क्या समझेगा हमारे दर्द को,
हम तो अपनों को भी नहीं समझा पाए हैं।
अब तन्हाई ही अपनी महफिल है,
खामोशी ही अपनी मंजिल है।
न किसी से उम्मीद, न किसी से गिला,
बस यही अब अपनी आखिरी हासिल है।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला अमन सनातनी
सावनेर नागपुर महाराष्ट्र













