
हाथ वो अपने छुपा देता है।
रोज जो मुझको सजा़ देता है।
मैं यहाँ दोस्ती निभाता हूँ।
वो वहाँ मुझको दग़ा देता है।
होश में रहना हिदायत जिसकी,
वो ही पीने की रज़ा देता है।
बात निकली तो पहुँच जायेगी,
क्यों उसे और हवा देता है।
मैं दुआओं से संभल जाऊंगा,
बेवजह मुझको दवा देता है।
कहना चाहे जो सदाएं मन की,
लफ़्ज़ वो लिख के मिटा देता है।
नवीन माथुर पंचोली
अमझेरा धार मप्र 454441













