ना ताज था, ना फौज थी, एक लाठी थी हाथ में,
पर उसी लाठी से हिला दिया राज को एक रात में।
वो चला तो पीछे पूरा हिंदुस्तान चला,
उसके एक इशारे पर तूफान भी रुका।
ना गोली चलाई, ना किसी का खून बहाया,
सत्य से ही उसने अंग्रेजों को झुकाया।
भूखा रहा पर झूठ की रोटी नहीं खाई,
सच के लिए अपनी धोती तक जलाई।
चश्मा पहने, धोती पहने, दिल में आग थी,
साबरमती में बैठा था, पर सोच में बाग़ थी।
चक्की चलाता था और देश को जगाता था,
बकरी का दूध पीता था और शेरों को झुकाता था।
कहता था सच बोलो, फिर चाहे जान चली जाए,
झूठ के आगे कभी भी शान न झुक जाए।
पहले खुद सहो, फिर दुनिया को सिखाओ,
जो खुद न करो, वो औरों से न कहलवाओ।
गोली खा कर भी उसने बदला नहीं माँगा,
मरते-मरते भी बस भारत माँगा।
हे राम कह के वो मिट्टी में मिल गया,
पर जाते-जाते हर दिल में सच बो गया।
आज भी वो जिंदा है हर सच्ची बात में,
हर उस हाथ में जो उठता है इंसाफ में।
जहाँ भी कोई सच के लिए लड़ता है,
वहाँ आज भी बापू ही दिखता है।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला अमन सनातनी
सावनेर नागपुर महाराष्ट्र












