
‘दिव्यं वर्षसहस्रं हि शाकेन किल सुव्रता,
आहारं सकृत्वती मसि मासि नराधिप,
ऋषियोअभ्यागता स्तत्र देव्या भक्त्या, तपोधनाः,
आतिथ्यं च कृतं तेषा शाकेन किल भारत ततः
शाकम्भरीत्येवनाम तस्याः प्रतिष्ठितम’
महाभारत-वनपर्व -८४,१४-१५
हे! शाकम्भरी मैया! आस लगा आए तेरे द्वार।
कष्टमुक्ति और मनोवांच्छित फल मिलें बारम्बार!
हे ! शाकम्भरी मैया ! आस लगा आए तेरे द्वार।
रूरूपुत्र दुर्गम दैत्य से आतंकित थे सब नर-नार।
देवलोक में त्रस्त देव भी,पा न पाये दनुज से पार।
ऋषि,मुनि,द्विज सर्व भू पर कर रहे थे हाहाकार।
सभी ने शाकम्भरी से की पुकार,रहकर निराहार!
सुन व्यथा,मां ने क्रोधित हो दुर्गम लिया ललकार।
आसुरी माया का, कुछ ही क्षण में किया निस्तार ।
दुर्गम दैत्य पे पंच बाण से’वीरखेत’में किये प्रहार।
शाकम्भरी मां ने दस शक्ति से किया दनुज संहार।
चहुंदिशा फैला प्रकाश,बस तेरी थी जय-जयकार।
चतुर्वेद देवों को अर्पित कर,नसाया आसुरी भार।
चिरकाल से जन-जन ने झेली थी सूखे की मार।
करुणामयी मैया के नयनों से बही जो जलधार।
शाक-सब्जी-फल-अन्न से जगती हुई सदाबहार ।
शाक से ‘शाकम्भरी’ नाम जन-जन लिया पुकार।
‘भूरादेव’- परमभक्त माता का,जो ‘दुर्गम’ से रण में
खूब लड़ा, जिस ने मां से पहले पाया सत्कार।
राजा चंद्रगुप्त,चाणक्य संग,नंद का आतंक हटाने,
आया था आशीष को पाने, हे माता तेरे दरबार ।
तेरी आशीष से ‘मंगल पांडे’ने देख धर्म तिरस्कार!
क्रांति की अलख जगाई,हिल गई अंग्रेज़ सरकार।
मां शाकम्भरी-भीमा-भ्रांबरी-शताक्षी हैं गर्भागार।
दरश से कामना हो पूर्ण, होवे भक्तों का उद्धार।
मैया!तेरे चरणों में दंडवत् ‘महेश’ पाये सदा दुलार!
हर जन्म में,सनातन धर्म में,हो तेरी जय-जयकार!
माता शाकम्भरी के चरण कमलों सादर भेंट













