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ऐँ ह्रीँ क्लीँ चामुण्डायै विच्चे

( ७ )

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरस्थिता
लम्बोष्टी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।।

वामपादोल्लसल्लोहलता कण्टकभूषणा वर्धनमूर्धाध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी।।

कपाल कंङ कारिणी, खड़ग खंङ धारिणी ।

महाकाली कालिके , नमामि भक्त तारिणी ।।

  ।। कालरात्रि की वन्दना ।।

दुष्टदलनी,शुभ करिणी,विकट मार्ग पगधरणी ।

दानव-दैत्य ,भूत-पिशाच सर्व भय-मुक्त करिणी ।

त्री नेत्र,मुक्त केश ,चतुर्भुजा, कालीरूप तूं वर्णी ।

नासिका से ज्वालाएं श्वास क्रिया की अवतरिणी।

खर वाहन,दक्षिण हस्त खड़ग, नरमुद्रा धरिणी ।

वाम हस्त ज्वाला, दूजा अभय-सुख करणी ।

मधुर्कटप संहारा, शुंभ-निशुंभ का सिर उतारा ।

खप्पर ले कूदी रण में,रक्तबीज-रक्त पीगई सारा।

रक्तबीज को रण में मारा, कष्ट भक्तों का निवारा ।

असुरों का मिटा आधारा,भू पर फैला उजियारा।।

बाह्य रूप अति भयानक, अंतर से स्नेह भंडारी।

माता का सप्तम् रूप , जग के सर्व कष्ट संहारी।

श्वेतमाल तड़िता सम धारी, जगती हुई उजियारी।

हे !’शुभंकरी’ गुण भक्त गाएं तेरे, हैं वो बलिहारी।

सृष्टि संचालन और संयोजन का तूं है कारण ।

आसुरी अत्याचार व पापों का तूं करे निवारण।

हे ! मां कलियुग में कब हो फिर तेरा अवतरण।

‘विनय करे ‘महेश’ कैसे हों मनोद् गार समर्पण ।

मां कालरात्रि के चरणों में समर्पित ।

                                      महेश शर्मा

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