
कालरात्रि देवी धरें ,सप्तम माँ अवतार ।
हे माँ त्रिनेत्र धारिणी,नमन तुम्हें सौ बार।
सती शिवानी अम्ब का , कालरात्रि अवतार।
दुष्ट दलन को जब उठीं , काॅंप उठा संसार।।
दिवस सप्तमी पूजिए, खुलें सिद्धि के द्वार ,
देवी कालरात्रि करें, सबकी नैया पार I
गुड़ का भोग लगाइए, हर पूजन के बाद
देवी के आशीष से, दुश्मन हों बर्बाद I
देवी काले रंग की, बिखरे सिर पर बाल ,
दुष्ट लोग जब देखते, होते शीघ्र निढाल I
चमकीली माला गले, रहती गधे सवार ,
एक हाथ काँटा लिए, दूजे में कटार I
वर मुद्रा में तीसरा, देवी का है हाथ ,
मुद्रा चौथे की अभय, जो भक्तों के साथ I
मधु कैटभ को मारकर, किया दुष्ट का अन्त ,
सारे दुख उनके हरे, जो थे साधू सन्त I
देवी शुभ फल-दायनी, प्राप्त करें आशीष ,
पूरे भक्ति भाव से, सदा झुकाएं शीश I
राक्षस भूत पिशाच सब, रहें सदा भयभीत ,
देवी, साधू सन्त को, समझे अपना मीत।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार













