
माँ जगदम्बा के अष्टम दिन, महागौरी माँ आतीं,
दिव्य रूप की ज्योति बिखेरें, जग को राह दिखातीं।
करो ध्यान माँ के रूप का, मन का तम मिट जाए,
कृपा-सुधा की वर्षा से, जीवन पुष्पित हो जाए॥
आदिशक्ति, जगजननी माँ, सृष्टि का आधार,
तेरी महिमा अपरंपार, जग में जय-जयकार।
शंख-चंद्र-सी शुभ्र छवि, कुंद-कुसुम-सी कांति,
तेरे चरणों में मिले, मन को परम शांति॥
दक्ष-भवन में सती बनीं, शिव के प्रेम में लीन,
शिव-अनुराग हृदय में लेकर, रहीं सदा तल्लीन।
दक्ष-यज्ञ में शिव-अपमान, सह न सकीं भवानी,
देह त्यागकर चली गईं, शिव की प्रिया कल्याणी॥
हिमगिरि के पावन गृह में, फिर अवतरित हुईं,
मैना के आँगन में आकर, जग की आशा बनीं।
पार्वती के रूप में, शिव-प्रेम हृदय में जागा,
शिव को पाने का संकल्प, जीवन का अनुरागा॥
राजमहल के सुख तजे, वन-पथ लिया सँभाल,
शिव को पाने के लिए, तप का किया कमाल।
धूप, शीत और वर्षा में, अडिग रहीं भवानी,
धैर्य, निष्ठा, प्रेम की, बनीं अमर निशानी॥
ऋतुएँ बदलीं, समय ढला, पर मन नहीं डोला,
शिव के ध्यान में लीन रहीं, शिव-नाम ही बोला।
कठिन तपस्या के प्रभाव से, तन का वर्ण हुआ श्याम,
अडिग साधना के साथ मुख पर, बसता रहा शिव-नाम॥
तप की धूल लपेटकर, तन हुआ मलिन अपार,
पर मन में जलती रही, श्रद्धा की उजली धार।
पौराणिक मान्यता कहे, शिव तप से प्रसन्न हुए,
गंगाजल के पावन स्पर्श से, तन-मन उज्ज्वल हुए॥
विद्युत-सी आभा जगी, मुख पर दिव्य प्रकाश,
गौरवर्ण की छटा से, जग में हुआ विकास।
शंख, चंद्र और कुंद-सी, निर्मल जिनकी कांति,
महागौरी के ध्यान से, मन में उतरे शांति॥
तप की ज्वाला से खिला, सौंदर्य अलौकिक रूप,
धवल प्रभा में झलकता, दिव्य तेज का स्वरूप।
त्याग, तपस्या, प्रेम से, महिमा हुई महान,
महागौरी नाम से, गूँजा सकल जहान॥
वृषभवाहिनी, चतुर्भुजी, करुणा का भंडार,
अभय-हस्त से हरतीं, भक्तों के संताप अपार।
कर में त्रिशूल सुशोभित, डमरू मधुर बजाए,
वरद-हस्त से माँ सभी पर, कृपा-सुमन बरसाएँ॥
श्वेताम्बर में शोभतीं, धवल ज्योति का रूप,
मुखमंडल पर दमक रहा, तेज अनंत अनूप।
शक्ति, शांति, साधना का, देतीं अमर संदेश,
तेरी कृपा से माँ सदा, आलोकित हो देश॥
नवरात्रि का अष्टम दिन, महाअष्टमी महान,
महागौरी की वंदना से, पावन हो जहान।
दीप जलें, आरती सजे, गूँजे जय-जयकार,
भक्ति-भाव से भर उठे, हर घर और परिवार॥
कन्या-पूजन, सेवा से, आँगन सुख बरसाए,
बाल-स्वरूप के मान से, मानवता मुस्काए।
नन्हीं कलियों की हँसी, जैसे प्रभात की ज्योति,
उनके सम्मान में छिपी, जग की सच्ची प्रीति॥
समता, सेवा, प्रेम से, जीवन बने महान,
दया, धर्म और सत्य से, बढ़े जगत का मान।
श्रद्धा केवल शब्द न हो, कर्मों में ढल जाए,
मानवता के पथ पर चलकर, जीवन सफल बनाए॥
क्लेश मिटें, संताप कटें, मन में शांति समाए,
सद्विचार के पुष्प खिलें, जीवन महकता जाए।
विघ्नों के बीच भी माँ, साहस का संचार,
तेरी कृपा से खिल उठे, आशाओं का संसार॥
हे महागौरी! अंतर्मन में, ज्ञान-ज्योति जगा दो,
द्वेष-दंभ के मरुस्थल में, करुणा-नीर बहा दो।
सत्य, प्रेम, सद्भाव से, जग का हो उद्धार,
तेरी ज्योति से माँ खिले, धरती का संसार॥
तेरी तपशिखा सिखाती, दृढ़ संकल्प का मान,
तेरी निर्मल छवि बताती, पावनता की शान।
धैर्य, समर्पण, प्रेम, दया, जीवन के शृंगार,
इन सद्गुणों से महके, अपना सकल संसार॥
मन का मैल मिटे सदा, सद्भावों का वास,
दीन-दुखी के प्रति जगे, करुणा और विश्वास।
तेरी ज्योति हृदय में जगे, मिटे अज्ञान-अँधियार,
प्रेम-सुगंध से भर उठे, जीवन का संसार॥
सत्य-पथ पर पग बढ़ें, निर्मल हों विचार,
तेरी कृपा से माँ खिले, सद्भावों की बहार।
दुखियों के अधरों पर, फिर मुस्कान सजाना,
हे माँ महागौरी! जग में प्रेम-ज्योति जलाना॥
जय जगदम्बे! जय महागौरी! जय माँ दुर्गा!
जय भवानी, मंगलकारी! जय आदिशक्ति!
जय धवल ज्योत्स्ना, जग की पालनहार!
तेरे चरणों में माँ, शत-शत नमस्कार!
रूपेश कुमार
चैनपुर, सीवान, बिहार













